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Rautia meeting west Bangal darjiling

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🚩⚔️ #सदान_रौतिया_समाज_पश्चिम_बंगाल_प्रदेश_समिति की बिजलीमुनी चाय बगान (दार्जिलिंग) में साधारण बैठक सभा की गयी। जिसमें समाजिक समस्याओं पर चर्चा की गयी और उस पर पहल करने की बात कही गयी, अपने रौतिया को एकजुट एकता जागरूकता करने के साथ ही बंगाल के तराई डुवार्स सदान बहुल क्षेत्र है लेकिन सदानों में जागरूकता एकता और एकजुटता बिल्कुल नहीं है, सदानों को एकजुट और संगठित होना है, सदान बिल्कुल संगठित नहीं हैं जिसका फायदा सदानों को गुमराह कर दुसरे संगठन के लोग उठाते हैं, बिखरे हुए अपने सदानों को एकजुट करना समाजिक एकता बनाना और सदानों को एकमंच पर लाने पर चार्चा की गयी। बैठक सभा में मुख्य रूप से उपस्थित थे कृष्णा सिंह रौतिया, दिनेश सिंह रौतिया तथा काफी संख्या में समाज के अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे।

असम रौतिया समाज

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🚩⚔️#असम_प्रदेश_रौतिया_समाज_संस्कार_समिति_सभा 17/11/2019 दिनांक रविवार।⚔️ 🚩🚩⚔️ #जय_भवानी_जय_रौतिया⚔️🚩🚩

West Bangal Rautia samaj

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#17_Nov दिनांक रविवार को पश्चिम बंगाल के डुवार्स के मालबाजार शहर में सदान रौतिया समाज की चिंतन बैठक सभा की गयी। इस बैठक में असम प्रदेश सदान रौतिया समाज संस्कार समिति के प्रतिनिधि अध्यक्ष- रायचंद्र सिंह, राजू सिंह रौतिया, बीजू सिंह रौतिया, पुतूल रौतिया इत्यादि शामिल थे। प.बंगाल सदान रौतिया समाज की ओर से कृष्णा सिंह रौतिया, दिनेश सिंह, पुसा सिंह रौतिया, रामानंद सिंह इत्यादि उपस्थित थे। इस बैठक सभा में समाज के विभिन्न विषयों पर चर्चा की गयी और उस पर पहल करने की बात कही गयी। जिसमें मुख्य विषय था- समाजिक एकता को मजबुत करना समाज में भाईचारा बनाना, अपनी सदानी यानी सादरी भाषा संस्कृति का संरक्षण करना इत्यादि मुख्य विषय था जिस पर पहल किया जाएगा। श्री दिनेश सिंह ने कहा कि जिस तरह असम बंगाल में हम सदानों की भाषा संस्कृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा आदिवासी संगठनों के नेताओं द्वारा उसे देखते हुए हम सदानों को एकजुट होकर आगे आना होगा और हम सदानों की मातृभाषा के साथ हो रहे खिलवाड़ को रोकना होगा,आदिवासी संगठनों के नेताओं को बार बार सादरी को आदिवासीयों का भाषा बताना बंद करना होगा,,, हमें बताना होगा ...

Rautiya village बेलगांव ,gumla

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#बेलगांव #जो_आँखों_ने_देखा_उसी_को_इस_लेख #में_लिख_रहा_हूँ ,गुमला से बिलकुल कुछ ही दूरी में स्तिथ रौतिया गांव बेलगाँव । बेलगाँव के बारे काफी कुछ सुना था पर कभी जाने का मौका नही मिला था ,कुछ महीने पहले रास्ते से गुजर रहा था तो गूगल मैप से गांव को ढूंढ कर बेलगाँव चला गया , गांव से पहले एक रौतिया  छात्रवास दिखा आगे एक आम का बगीचा उसके आगे गया तो रास्ते के किनारे स्वतंत्रा वीर सेनानी बख्तर साय और मुंडल सिंह की मूर्ति बनी हुई थी , आगे गांव के अंदर जैसे ही घुसा सामने एक बजरंग बली की प्रतिमा नजर आयी ,भगवान को प्रणाम करते हुए आगे बढ़ा , चारों तरफ मैंने नजरें गुमा कर पूरे गांव को देखा ,,पुरे गांव को देखने के बाद मैं काफी उदास हो गया ,,हर रौतिया गांव की तरह यह गांव भी मुझे एक सन्नाटे से भरी मायूसी वाली जिन्दगी लोगो की लगी , ,मेरे मन में एक ही बात चल रही थी ,की एक गांव जो गुमला के इतने नजदीक है, फिर भी गांव में समय के साथ कुछ नही बदला है ,चंद सालों में गुमला के चारो ओर घर बनते जा रहे ,दूर दूर से लोग जमीनें लेकर घर बना रहे दुकानें खोल रहे , और जो कई पीढ़ियों से उस गांव में रह रहे ,वो आज भी...

ढेकी स्वदेशी मशीन

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#सभी_रौतिया_भाई_बहन_पढ़े इस स्वदेशी परम्परागत मशीन का नाम है ढेकी । सभी रौतिया गांव और परिवारों में इसका खास उपयोग और महत्व था ,इस ढेकी से चावल, गेहूं ,कई तरह के अनाजो को पिसा जाता था ,इस ढेकी में एक छोर को पैर से दबाया जाता था ,दूसरे छोर में  लोहे का गोल सा समान लकड़ी के साथ लगा रहता था ,उस लोहे के द्वारा ही अनाज की पिसाई होती थी ,,,,पहले जमाने में आधुनिक मशीने लोगो के पहुँच से काफी दूर थे ,सभी परिवारों में इस ढेकी से ही अनाज पीसे जाते थे ,यह ढेकी एक  वैज्ञानिक आधार से भी काफी लाभदायक था ,इसके द्वारा पीसे हुए अनाज में पोषक तत्व की मात्रा  काफी होती थी और पोषक तत्व बरकरार होते थे ,,सुबह उठ कर ही घर की महिलाएं पैरो से ढेकी के एक छोर में दबाव देते और दूसरे छोर से वो अनाज को पिसता था ,इस प्रक्रिया में महिलाओे का शारीरिक  कसरत भी हो जाता था,क्यों की इससे ब्लड सर्कुलेशन काफी अच्छा होता था और कई बीमारियों से हमे सुरक्षित करता था,,,,हाथ के द्वारा भी चक्की से अनाज पीसे जाते थे जिसका फायदा  महिलाओ को गर्भपात के दौरान काफी फायदा मिलता था ,क्यों की चक्की को हाथ से गु...

गांव का जीवन और महिला का संघर्ष

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# पूरा_पढ़े #गांव_का_जीवन_और_महिला_का_संघर्ष आज मैं गांव के जनजीवन में महिलाओं के कार्यो के बारे जिक्र करने वाला हूँ ,एक परिवार और घर में एक माँ ,एक स्त्री का अहम रोल होता है ,वो घर की लक्ष्मी होती हैं , हमारे रौतिया परिवारों में महिलाएं सुबह से लेकर शाम तक पुरे दिन घर का काम से लेकर खेतो का काम भी बखूबी करती हैं ,गांव में सबसे पहले ,सुबह उठ कर  घर की  माताएं बहने घरों में आँगन में झाड़ू लगाती हैं ,उसके बाद घर के सारे गंदे बर्तन धोती हैं ,कुँए और नलकूप से पिने का पानी लाती हैं ,फिर पुरे परिवार के लिए खाना बनाती हैं ,पुरे घर में बच्चो से लेकर खाने पीने की सारी जिमेवारी एक माँ में होती है ,,,ज्यादातर रौतिया परिवारों का घर कच्चे मिट्टी से बना होता है इसके कारण समय समय पर गोबर से लीपना भी पड़ता है ,घरों में लिपाई पुताई कर साफ़ सफाई करनी पड़ती है ,अगर एक गांव में महिला का पूरा जीवन देखेंगे तो संघर्ष और मेहनत से भरा होता है , पुरे घर को खाना खिलाने के बाद ही घर की माताएं खाना खाती हैं, ये हमारे परिवारों के संस्कार हैं, ज्यादातर पति पत्नी में बोलचाल संवाद बहुत ही इज्जत के साथ आउ ...

बचपन की यादें

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#पढ़े_और_बचपन_की_यादें_ताजा_करे ।बचपन की वो यादें ,जब बच्चो के साथ खूब खेला करते थे ,कभी साइकिल के पहिए को गाड़ी बना लेते ,कभी चप्पल को काट पहिए  बना लेते ,कंचे आटे खेलते दिन गुजर जाता था ,लुका छिपी का खेल बड़ा मस्त होता था , गांव के नदियों में या तालाबो में खूब उछल उछल कर छलांगे लगाते ,और कभी झगड़े होते तो wwe जैसा एक्शन वाला मार पीट भी हो जाता ,,बचपन में सबका उपनाम होता था ,चिढ़ाने के लिए कई तरह के नामो से संबोधन  किया जाता था ,बचपन में दुनियादारी से दूर अपनी दुनिया थी ,बचपन में मार पीट और लड़ाई का भी अपना मजा होता था ,होली के दिन का बचपन में काफी इंतेजार रहता था ,कुछ दिन पहले से ही बांस काट कर पिचकारी बनाई जाती थी ,और पलास के फूलों को पानी में उबालकर रंग बनाया जाता था,शैतान बच्चे तो रंग में केले का गद मिला  देते ,उनको ऐसा करके लगता कि मानो उन्होंने परमाणु हथियार बनाया हो ,,खूब दौड़ा दौड़ा कर रंग लगाया जाता ,फिर होली खेलने के बाद सभी नदी तालाबो में चेहरे और हाथो का रंग निकालते ,घरों में उस दिन गरमा  गर्म धुसका ,बरा ,मालपुआ ,बन कर तैयार होता था ,,,गांव में बीती ,पीठो का...